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नागरिकता संशोधन कानून है क्या?



सीएए से आखिर आम आदमी की जिंदगी कैसे बदल जाने वाली है ?


इसीलिए आज इस आर्टिकल को आप आखिर तक इत्मीनान से जरूर देखिएगा क्योंकि आज आपके वह तमाम सवाल जो सीएए से जुड़े हुए हैं उन सभी सवालों का  जवाब हम इस आर्टिकल में देने वाले है।

What Is CAA Act?

सीएए है क्या ?


नागरिकता संशोधन कानून। जिसे केंद्र सरकार ने साल 2019 का वो वक्त था जब संसद में पास किया था। अब इस बिल का उद्देश्य पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए छह समुदायों जिसमें हिंदू, ईसाई, सिख, जैन, बौद्ध और पारसी शामिल हैं इनके शरणार्थियों को भारत की नागरिकता देना है। वैसे इस बिल में मुस्लिम समुदाय को शामिल नहीं किया गया और इसी  मुद्दे पर जो राजनीतिक पार्टियां थी उनकी तरफ से जबरदस्त विरोध किया जाता रहा है समय-समय पर। अब हम आपको यह बताते है की 3 साल पहले जब संसद में यह संशोधन कानून पास हुआ था तो इस पर पूरे देश में एक तीखी प्रतिक्रिया और विरोध भी देखने को मिला था। सियासी पार्टियों ने भी इसका विरोध किया लेकिन सरकार ने इसे लेकर ना केवल स्थिति स्पष्ट की बल्कि इस कानून को लेकर जवाब भी दिए हैं। 

अब हम ये जानते हैं कि आखिर ये बिल और इसे लेकर सरकार का क्या कहना रहा है और कैसे ये चुनाव से पहले लागू होने वाला है यह भी तय है।

आखिर नागरिकता संशोधन कानून है क्या?


ये कानून किसी को भी नागरिकता से वंचित नहीं करता है। यह किसी को नागरिकता बल्कि देता है और यह केवल उन लोगों की श्रेणी को संशोधित करता है जो नागरिकता के लिए खास तौर पर आवेदन कर सकते हैं। अब ऐसा उन्हें आवेदन यानी जो आवेदन करने वाले हैं उन्हें अवैध प्रवासी की परिभाषा से छूट देकर करता है। कोई भी व्यक्ति जो कि हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी या ईसाई समुदाय से ताल्लुक रखता हो और अफगानिस्तान बांग्लादेश या पाकिस्तान से हो जो कि भारत में 31 दिसंबर 2014 को या इससे पहले प्रवेश कर चुका हो और जिसे केंद्र सरकार के द्वारा पासपोर्ट अधिनियम 1920 की धारा तीन की उपधारा या किसी भी नियम या आदेश के तहत छूट दी गई हो। 

अब मैं आपको यह भी बता दूं कि इस छूट के लिए कानूनी ढांचा 2015 में गृह मंत्रालय की तरफ से जारी दो अधि सूचनाओं में पाया जाता है। वो क्या है यह भी मैं आपको बताता हूं। 

सबसे पहले ये जानिए कि चार जो अधिसूचना केवल उन्हीं लोगों को छूट देती है जो हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी या ईसाई हैं। अब अफगानिस्तान बांग्लादेश या पाकिस्तान से हैं और अगर वो भारत में 31 दिसंबर 2014 से पहले धार्मिक उत्पीड़न की आशंका से भारत में प्रवेश कर गए थे तो ये उनके लिए है। 

अब एक सवाल आपके मन में जरूर इसके बाद यह होगा कि आखिर नागरिकता कानून जो है वो करता क्या है ?


ये कानून उन्हें खुद बखुदा नहीं देता बस उन्हें इसके आवेदन के लिए योग्य बना देता है। इसका मतलब यह कि उन्हें यह दिखाना होगा कि वह भारत में 5 साल रह चुके हैं। साबित यह भी करना होगा कि वह भारत में 31 दिसंबर 2014 से पहले आए थे। अब साबित इसमें यह भी करना होता है कि वह अपने देश से धार्मिक उत्पीड़न के कारण ही भाग कर अपने देशों से वो यहां आ गए थे। अब उन भाषाओं को भी वो बोलते हैं जो संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल है और नागरिक कानून 1955 की तीसरी सूची की जो अनिवार्यता एं हैं उनको पूरा करता हो। इसी के जरिए वह आवेदन के पात्र हो सकते हैं। उसके बाद यह भारत सरकार पर होगा कि वह उन्हें नागरिकता दे या फिर नहीं यह भारत सरकार तय करता है। 

आपके मन में जरूर होगा कि शरणार्थियों को आखिर वीजा भारत की तरफ से कैसे जारी किया जाता है ?


जो शरणार्थी पात्रता नहीं रखते यानी कि धर्म के बगैर भी वो भारत को जो शरणार्थी नीति के साथ सुरक्षित रहते रहेंगे। अब आपको मैं बता दूं कि शरणार्थियों को भारत में रहने के लिए लंबी अवधि के स्टे वीजा जारी किए जाते हैं। अब आपको यह भी जान लेना चाहिए कि यूएन रिफ्यूजी एजेंसी के अनुसार भारत में म्यानमार यानी कि बर्मा, श्रीलंका, अफगानिस्तान इस तरह के देशों के बहुत सारे ऐसे शरणार्थी हैं जो आराम से रह रहे हैं। सरकार का कहना यह है कि यह कानून मुस्लिम शरणार्थियों को कवर नहीं करता, क्योंकि हमारी स्थिति यह है कि जब हालत उनके लिए सुरक्षित हो जाएगी तब शरणार्थी अपने घर वापस लौट सकते हैं और लौट जाना चाहिए यह भी इसमें कहा जाता है।

अब एक और बड़ा सवाल यह भी है कि भारत शरणार्थियों को वीजा आखिर देता कैसे है ?


तो यह भी जान लीजिए। भारत की हमेशा की नीति गैर समावेश की थी। इस सरकार के होने से बहुत पहले से ही। कुछ देश विशेष तौर पर संवैधानिक तौर पर इस्लामी राष्ट्र हैं। अब वहां का जो आधिकारिक धर्म है वो इस्लाम है। जबकि कुछ मुस्लिम भागकर भारत में आते हैं। वो अपने देशों में जुल्म और अत्याचार के हालत के चलते वहां से भागकर भारत आ जाते हैं। अब इस बात का कोई मतलब नहीं बनता कि उन्हें नीति दृष्टिकोण के अनुसार न्यूट्रलाइज कर दिया जाए। 

अब एक सवाल यह भी है कि गैर मुस्लिम शरणार्थियों के लिए आखिर दिक्कतें क्या हैं ?


गैर मुस्लिमों के लिए पड़ोसी देशों में संवैधानिक तौर पर दिक्कतें हैं। उन्हें लेकर एक ऐसा दृष्टिकोण है कि उनके साथ वहां ऐसे अत्याचार होते हैं मानो वो वहां रहने के लायक ही ना हो। अब इसीलिए जो गैर मुस्लिमों के लिए एमनेस्टी का मतलब बनता है। जबकि मुस्लिमों को अलग-अलग केस के तौर पर यहां पर लिया जाता है। अब उदाहरण के तौर पर जैसा हमने सीरिया, अफगानिस्तान इस तरह के कई सारे देशों से आने वाले मुस्लिमों के लिए किया भी है। 

एक बड़ा सवाल यह कि रोहिंग्या मामले को सरकार किस तरह से ले रही है ?


तो यह भी जानिए कि बर्मा की स्थिति यह है कि रोहिंग्या वास्तविक तौर पर अविभाजित भारत के समय भारत आए थे। तब जब कि  ब्रिटेन ने बर्मा पर कब्जा कर लिया। अब इसीलिए बर्मा उन्हें अपने जातीय ग्रुप और योग्य नागरिकता में नहीं रखते हैं। भारत इस विवाद में फंसा हुआ है कि अगर भारत रोहिंग्या को भारत में न्यूट्रलाइज का अधिकार दे देता है तो यह बर्मा के साथ-साथ हमारे नाजुक विवाद को अपसेट कर सकता है। भारत में रोहिंग्या को शरणार्थी प्रोटेक्शन और साथ ही लॉन्ग टर्म वीजा मिला हुआ है लेकिन वह भी अभी नागरिकता के योग्य नहीं होंगे। 

अब सवाल यह भी है कि क्या यह कानून मुस्लिमों के खिलाफ है ?


जिस पर राजनीति भी बहुत हुई है। अब सरकार का पक्ष यह रहा है कि यह कानून मुस्लिमों के खिलाफ बिल्कुल भी नहीं है।

(ये आर्टिकल में सामान्य जानकारी आपको दी गई है अगर आपको किसी भी उपाय को apply करना है तो कृपया Expert की सलाह अवश्य लें)

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